इक सफ़रपे निकली है ये कश्ती जैसे किसी साहिल की तलाश हो हवाओमैं ढुंढ रही है रास्ता पर क्या कभी समझ पाएगी वो लहेरेही है रास्ता और वोही मंझिल भी