रोज नया कुछ लिखता हुँ मैं खयालोका बोझ कम करनेकी चाह मे
फ़िर अल्फजोसे भरा कगज देख नया कगज खोजता हुँ
अंदर जल रहे शोलों को हवा देने के लिये
फ़िर से जुट जाता हुँकलम के साथ नये खयालोको तराशने
इक मंदिर बन जाता है अपनेआप बिना मेरे सोचे
मानो भगवान खुद ही आ गये हो मुझसे मिलने
सख्तेमे रह जाती है आँखे
दंग रह जाती है रुह
फ़िर एहसास होता है वो हर जगह है......
---- वैभवी भिडे
फ़िर अल्फजोसे भरा कगज देख नया कगज खोजता हुँ
अंदर जल रहे शोलों को हवा देने के लिये
फ़िर से जुट जाता हुँकलम के साथ नये खयालोको तराशने
इक मंदिर बन जाता है अपनेआप बिना मेरे सोचे
मानो भगवान खुद ही आ गये हो मुझसे मिलने
सख्तेमे रह जाती है आँखे
दंग रह जाती है रुह
फ़िर एहसास होता है वो हर जगह है......
---- वैभवी भिडे
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