क्यूँ ना कहु अपने दिल कि बात?
क्यूँ रखु छुपाके हर जजबात?
क्या बदलेगा ऐसी खमोशीसे?
या होगा हर पल भरा खुशियोसे?
तो क्यूँ न कहु सदियोसे छुपे राज को?
आजाद करु अनकहे जमीर को?
क्यूँ चुनु रास्ता औरोका ?
क्यूँ न देखु नक्शा मेरे दिल का?
क्या मिलेगि मंज़िल ऐसे चलनेसे?
जो सजी होगि सिर्फ़ फ़ुलोसे?
तो क्यूँ ना चलु एक डगर नयी?
हरीभरी बेखबर पर मनचाही
क्यूँ लिखु जो है सबको पसंद?
मिठे अल्फाजोका बनाके गुलकंद?
क्या बदलेगा सच यु छुपानेसे?
या मिलेगि तस्सली ऐसे झूटसे?
तो क्यूँ न लिखु जो मुझे है बताना
एक कडवासा सच, नया अफ़साना?
क्यूँ उडु आसमाँ मे औरोके कंधेपे सवार
क्या ऐसे पोहच पाउंगी कभी उस पार?
तो क्यूँ न फ़हराउँ पंख अपने
जियूँ एक पंछी के सपने?