हवाओ से मैने इक किस्स सुना था
दुर कही पर्वतोपर
फ़किर हुआ करता था
लोग पुछा करते थे अपना नसीब उसे
वो हसकर आँखे बंद कर लेता था
कहाँ से आया था
न कोइ जाने
अक्सर मिट्टी मे कुछ लिखता रहता था
आया था इकबार मुसाफ़िरो का झुंड वहा
उन्हे देख फ़किर थोडासा चौंका था
दो आँहे हुइ थी बेहद नम
जब उन्होने मिट्टी मे पढा था
" बस इसी पल के लिये ..... "
अब उस पर्वत पर कोई नही रहता
बस फ़किर का कटोरा है छुटा हुआ
सुना है अब लोग उसमे सिक्के डालते हैं मन्नतो के
और कोई दुर गाता जाता है
" नसीब मैं कभी कभी नसीब ही नही मिलता "
----- वैभवी भिडे
No comments:
Post a Comment