Tuesday, June 17, 2014

बरसते बरसते हम युही खामोश हो गये 
जैसे जमीन के दामन से पानी चुराकर 
रेगिस्तान बन जाता है 
ढूढनेपर भी नही मिल रहे 
नमी के नामोनिशान 
आसमान भी बेरंग सफेद 
काले बादल के बिन मातम मे चूर 
क्या होगा हश्र ए खुदा 
सून ले कभी तू रेत की सदा 
माफ कर सारे उसके गुनाह 
लौटा उसे उसकी हरीभरी वजाह 
खेलने दे उसे फिर इकबार बुन्दोसे 
दोहोराने दे उसे बारीश का सपना 
वो एक ही तो हिस्सा बचा है                                    
उसके बचपन का 

----- वैभवी भिडे

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