बरसते बरसते हम युही खामोश हो गये
जैसे जमीन के दामन से पानी चुराकर
रेगिस्तान बन जाता है
ढूढनेपर भी नही मिल रहे
नमी के नामोनिशान
आसमान भी बेरंग सफेद
काले बादल के बिन मातम मे चूर
क्या होगा हश्र ए खुदा
सून ले कभी तू रेत की सदा
माफ कर सारे उसके गुनाह
लौटा उसे उसकी हरीभरी वजाह
खेलने दे उसे फिर इकबार बुन्दोसे
दोहोराने दे उसे बारीश का सपना
वो एक ही तो हिस्सा बचा है
उसके बचपन का
----- वैभवी भिडे
जैसे जमीन के दामन से पानी चुराकर
रेगिस्तान बन जाता है
ढूढनेपर भी नही मिल रहे
नमी के नामोनिशान
आसमान भी बेरंग सफेद
काले बादल के बिन मातम मे चूर
क्या होगा हश्र ए खुदा
सून ले कभी तू रेत की सदा
माफ कर सारे उसके गुनाह
लौटा उसे उसकी हरीभरी वजाह
खेलने दे उसे फिर इकबार बुन्दोसे
दोहोराने दे उसे बारीश का सपना
वो एक ही तो हिस्सा बचा है
उसके बचपन का
----- वैभवी भिडे
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