Tuesday, June 17, 2014

फिर लौट आया वो बारीश का एहसास 
कई सालोसे जो गुमाशुदा था
ताकझाक कर रहा झरोकोसे  
अपनी अटखेलियोसे गुदगुदा रहा है 
अब हसी कहा रुकनेवाली है घर में बंद 
आ ही जायेगी बाहर निकल   
फिरसे आंगन का कब्जा लेके 
कर देगी खामोशी को उथलपुथल 
सालोसे जमे बर्फीले पैर 
बह जायेंगे इस मौसम में 
फिर एक बार 
वोही सब दोहराया जाएगा 
बिना किसी सिलवट के बदले 
यकीन नही होता 
आज भी मैं बिलकुल नही बदली 

----- वैभवी भिडे

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